सारंगढ़। सारंगढ़ में पिछले कुछ महीनों के दौरान विकास कार्यों की ऐसी रफ्तार देखने को मिली कि लोगों को पहली बार महसूस हुआ कि जिला बनना सिर्फ प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि ज़मीन पर बदलाव का संकेत भी हो सकता है। नवीन जिला संयुक्त कार्यालय, एसडीएम कार्यालय और ट्रांजिट हॉस्टल के जीर्णोद्धार जैसे बड़े काम एक ही परिसर में शुरू होने से आम जनता को राहत मिलने लगी थी। लोगों को उम्मीद जगी कि अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की पुरानी परेशानी खत्म होगी और प्रशासनिक व्यवस्था व्यवस्थित रूप लेगी।
इसी बीच नालंदा लाइब्रेरी, लाइवलीहुड कॉलेज और गर्ल्स कॉलेज को विकसित करने की योजना ने शिक्षा के क्षेत्र में भी नई उम्मीद पैदा की। लोगों को लगा कि सारंगढ़ को अब केवल घोषणाओं का जिला नहीं, बल्कि शिक्षा और अधोसंरचना के नए केंद्र के रूप में तैयार किया जा रहा है। वहीं टिमरलगा को पर्यटन क्षेत्र बनाने की मुख्यमंत्री की घोषणा ने विकास की तस्वीर को और बड़ा बना दिया। इससे जनता में यह भरोसा मजबूत हुआ कि अब विकास सिर्फ मंचों और पोस्टरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़कों, भवनों और योजनाओं के रूप में दिखाई देगा।
इन तमाम विकास कार्यों के पीछे तत्कालीन कलेक्टर आईएएस संजय कन्नौजे की कार्यशैली को प्रमुख कारण माना जा रहा था। तय समय सीमा, लगातार मॉनिटरिंग और फाइलों की तेज गति ने प्रशासनिक व्यवस्था को नई पहचान दी। लोगों को लगने लगा था कि सारंगढ़ अब “घोषणा जिला” से निकलकर “निर्माण जिला” बनने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन जैसे ही विकास कार्यों ने गति पकड़ी, वैसे ही अचानक हुए ट्रांसफर ने राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं को गर्म कर दिया।
अब जिले की कमान नई कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू के हाथों में है। जनता उन्हें केवल नए अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि अधूरी उम्मीदों की नई जिम्मेदार संरक्षक के रूप में देख रही है। चुनौती सिर्फ अधूरे निर्माण कार्य पूरे करने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे को बनाए रखने की भी है जो पिछले कुछ महीनों में बड़ी मुश्किल से बना था।
सारंगढ़ में अब लोगों के बीच तुलना शुरू हो चुकी है। संजय कन्नौजे को लोग “रफ्तार वाले कलेक्टर” के रूप में याद कर रहे हैं और अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या नई कलेक्टर उसी गति को बरकरार रख पाएंगी या फिर प्रशासनिक मशीनरी दोबारा पुरानी धीमी चाल में लौट जाएगी।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में अब विकास योजनाओं से ज्यादा चर्चा ट्रांसफर राजनीति की हो रही है। आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि तेज काम करने वाले अधिकारियों का बार-बार तबादला होता रहेगा, तो फिर सुशासन और विकास के दावे आखिर किस हद तक जमीन पर उतर पाएंगे।
सारंगढ़ इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकास की इमारत मजबूत भी हो सकती है और फाइलों में दब भी सकती है। अब असली परीक्षा नई कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू की है—वे सिस्टम को नई दिशा देती हैं या सिस्टम की पुरानी चाल ही विकास की रफ्तार पर भारी पड़ती है।

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