साहित्य सृजन संस्थान की काव्य संध्या का हुआ आयोजन कवियों ने होली के फाग गीत और कविता की रंगारंग प्रस्तुति दिए …..”देखो फिर फागुन लाया है ..नेह प्रीत के रंग हो”””आओ हम तुम संग संग भीगे …सीमा पाण्डेय सीमा”

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लक्ष्मीनारायण लहरे
रायपुर । साहित्य सृजन संस्थान द्वारा लगातार जारी 42 वीं मासिक काव्य संध्या,सम्मान समारोह एवं स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का आयोजन वृंदावन हॉल, सिविल लाइन्स रायपुर में किया गया है।
इस काव्य संध्या में रायपुर एवं आसपास के जिलों के प्रतिष्ठित एवं युवा कवियों ने होली पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर होली पूर्व होली का माहौल बना दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ.संजय अलंग एवं विशिष्ठ अतिथि, डॉ राहुल शाह हड्डी रोग विशेषज्ञ ने अपनी रचना का पाठ किया।,श्रीमती शुभांगी आपटे,ब्रांड एम्बेसेडर ,नगर निगम रायपुर विशिष्ठ अतिथि ने नो प्लास्टिक और पर्यावरण पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वीर अजीत शर्मा एवं सफल संचालन उमेश कुमार सोनी “नयन”द्वारा ने किया ।

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संस्था द्वारा श्रेष्ठ काव्य पाठ हेतु मनोज शुक्ला एवं शशि किरण” इंदु”को सम्मानित किया गया।
काव्य संध्या में किशोर लालवानी,मुकेश सिंह राठौर, एच एस ठाकुर, एच डी पटेल,राजाराम रसिक,संतोष कुमार बिसेन,मधुकर राव ठोंक,संजय आपटे,नीरज बोधनकर,जबलपुर,अशोक कुमार खरे,दिलीप श्रीवास्तव,हबीब खान समर,बागबाहरा, डॉ पंकज वर्मा,राजकुमार पाण्डेय,शशांक खरे, उत्तरा कुमार सिंह,पिथौरा, खोमान लाल साहू,अनीता लालवानी,राजेंद्र डडसेना,
सभी ने काव्य पाठ का आनंद लिया। वहीं कवियों ने अपनी अपनी कविता से काब्य संध्या में रंग भरा । जिसमें प्रमुख रूप से कविता पाठ किए ….

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मितान
इस बार होली आएगी कैसे?
उसे कैलेंडर में खूनी लाल या जली काली तारीखें ही मिली
वह अब भी बच्चे के हाथ में रंग
की सोच रही
डॉ.संजय अलंग

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घुटनों में जब दर्द सताए,
चलना-फिरना मुश्किल हो जाए,
सीढ़ी चढ़ना लगे पहाड़,
मन भी हो जाए लाचार।

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डरिए मत इलाज से,
जो दे सकता फिर से अंदाज़ से,
चलने का सुख, मुस्कान नई,
ज़िंदगी में फिर उड़ान नई।

रिप्लेसमेंट कोई डर की बात नहीं,
ये हार नहीं, नई शुरुआत सही।
थोड़ा साहस, थोड़ा विश्वास,
फिर से होंगे कदम ख़ास।
डॉ.राहुल शाह

भावना जब सबल हो गयी,
मुश्किलें पल में हल हो गयी।
साथ विश्वास चलता गया,
कामयाबी अटल हो गयी।

ममता खरे ‘मधु’

बस नारे लगे मेरे नाम से,
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’,
क्यों जरूरी था, किचन का काम,
बस उसे ही सिखलाओ।
खाना यदि हाथों से बनता है,
उसमें लिंग निर्धारण क्यों होता है?
कश्विता जालान
रंग होता नहीं कभी रंग में,
रंग होता है सांसों के तार में,
रंग होता है घर के दीवार में,
तभी तो रंग जाती हूं तेरे नैनों के वार में,
रंग होता नहीं कभी रंग में,
वंदना ठाकुर बिलासपुर

दौड़ता रहा जिस खुशी की तलाश में ,वो मिली तो जैसे दरिया समंदर में समा गया
खुद को मिटा कर पाया चुकानी पड़ी कीमत रफ्तार की
क़तरा क़तरा हर लम्हा मुझसे मरी पहचान पूछता
मेरा बचपन मुझसे बड़े होने का सबब पूछता है
मनोज शुक्ला
रायपुर

ये कैसे बताऊँ कि तुम मेरे क्या हो
मेरे प्यार की इक हसीं इल्तिज़ा हो ।
ये माना कि जीवन मेरा इक चमन है –
गुज़रती है छू के जो तुम वो सबा हो ।

उमेश कुमार सोनी ‘नयन’

सोंधी माटी में विष बोया, दूब हुई जहरीली,
चौरे पर तुलसी मूर्च्छित है, पाती-पाती पीली।
धूल-धुआं ने डेरा डाला, वट तर नहीं ठिठोली,
पर बांधे पछिमा, पुरवइया, पीपल डाल न डोली।
__,राजकुमार धर द्विवेदी

मन में सवालात और ढेर सी बात,
करनी है लेकिन सकुचाई है।
बाबुल का आंगन छुटा अभी है,
जिससे कि अँखियाँ भर आई है।

रामचन्द्र श्रीवास्तव

मेरी जिंदगी को हवा दे रहा है
ख़ुदा कुछ न कुछ तो सदा दे रहा है

परेशानियों से मैं निकल जाता हूंँ जी
है कोई मुझे भी दुआ दे रहा है

अशोक कुमार दास
कोसरंगी, रायपुर

जो सत्य कहे सत्य निष्ठ रहे,
भय से सदा ही मुक्त रहे,
मुंह देखी जो बात न करता,
कहे वही, जो बात सही है,
सच मानें तो कवि वही है।
विरेन्द्र शर्मा “अनुज”

सीना छप्पन इंच है, दुश्मन भारत नीच है।
भारत छेड़े जंग है, आजादी के रंग है।
हरमन कुमार बघेल “हरि”
आरंग

रोने से तो ये रंज-ओ-अलम कम नहीं होंगे, क्या मज़ा जीने का, अगर ग़म नहीं होंगे, दुनिया मेरे शे’रों को कभी याद करेगी, दिन वो देखने को मगर हम नहीं होंगे
एस एन जोशी

प्रेम सुधा बरसाता निशिदिन, सब पर जादू डाला रे।*
बृज की गलियों में फिरता है, नटखट मुरलीवाला रे।।
सुषमा प्रेम पटेल

राहुल भैया के जीवन में, देखो कितना भार।
ना सत्ता मिलती है उनको, ना मिलती है नार।।

फैशन की करनी ऐसी है, क्या बतलाएं यार।
नारी नर सी लगती है अब, नर लगता है नार।

-राकेश अग्रवाल
कुछ तेरा मन डोल गया था कुछ किस्मत वीरान मिली,
तेरी चूनर हुई गुलाबी राह मुझे सुनसान मिली।

…राजेश जैन राही

आँखो में मेरी झाँक ये मंज़र न मिलेगा
बहते हुए पानी का समन्दर न मिलेगा

सोने से बने गहने या फ़िर रत्न पहन लो
मुस्कान से बेहतर कोई ज़ेवर न मिलेगा

देता है हर इक युग में ये इतिहास गवाही
हक़ आपको अपना कभी रो कर न मिलेगा
_आर डी अहिरवार

बचपन में पूरे परिवार का प्यार छुटपन का दुलार, मीठा संसार, मिट्टी से खेलना, चॉकलेट से खुश हो जाना, मिठाइयों से मन ना भरना, माँ की गोद में सोना, भाई से लड़ना – झगड़ना, छेड़ना मज़ाक उड़ाना, साथ में खाना, साथ में स्कूल जाना कितना अच्छा लगता है ये सब याद करके कितने प्यारे दिन थे वो।

मयूराक्षी मिश्रा…
नया रायपुर

बिनु गैया गौकुल सुना मधुबन वंशी बजाय कौन? बूचड़खानों के भय से कटते गैया लाए कौन?

क्या मर गई सारी संवेदना, क्या मार दिया तुमने आंखो का पानी, सारी दुनिया भीष्म हुई, घर घर छलती बिटिया, गईया को अब बचाए कौन?
पं अंजु पाण्डेय खरोरा

पत्नी ने बहुत लाड़ जताया,,
इतराकर पति को बताया,,,
मेरे दिल में सिर्फ तुम रहते हो,,,,
किसी और को रहने की नहीं है जगह,,,,

पति प्यार से मुस्कुराया,,
पत्नी को याद दिलाया,,

मंजू सरावगी मंजरी रायपुर

फगुआ गाते ढोल बजाते,
फगुआरों की टोली हैं।
दो पल साथ नहीं रह पाए,
यह भी कोई होली है।

विजया ठाकुर

पति, पत्नी के रिश्ते से खट्टा
कोई रिश्ता नहीं होता
पति, पत्नी के रिश्ते से मीठा
कोई रिश्ता नहीं होता
गर सध जाये संतुलन
इस खठास और मिठास का
तो इस रिश्ते से अच्छा
कोई रिश्ता नहीं होता
_शशि सुरेंद्र दुबे

देखो फिर फागुन लाया है ..
नेह प्रीत के रंग हो”””
आओ हम तुम संग संग भीगे …
तज के सारे द्वंद हो
नीले पीले रंग बासंती इंद्रधनुष से बिखरे हो “”
केसरिया फिर धरा हो जाए अम्बर धानी आज हो”””
सीमा पाण्डेय सीमा

दो रंग जहॉं में दिखते हैं
एक हंसना, एक रोना
पर इनमें मुखरित होता है
ख़ामोशी का होना

दो रंग जहॉं में हैं ऐसे
रंगहीन उनका होना
पर रंग सभी उनसे ही हैं
नीर, हवा का बहना

यशवंत कुमार चतुर्वेदी
रायपुर

हाँ वो है उसका होना जरूरी है क्या प्रेम मे प्रेमी का होना जरूरी है क्या.

वो काल्पनिक है उसका वास्तविक होना जरूरी है क्या…

मेरी कल्पनाओं में उसके प्रेम का एहसास है .

धनुष्का राजश्मि ध्रुव

जीजा जी को होली निमंत्रण

भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण
प्रियवर तुमको जीजा जी
अबकी होली फाग खेलने
आओ ससुराल में जीजा जी|
_ प्रमदा ठाकुर

हो सरल राम सा,
मेरे श्री राम सा,
राम की हो कृपा,
हो मनुज राम सा।

अर्चना श्रीवास्तव

कवियों के कविताओं से वृंदावन हाल सराबोर रहा ।

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