छत्तीसगढ़ : ये कैसा विकास ? गरीब बच्चों को पढ़ाने के बाद भी नहीं मिले 5 करोड़ रूपए….
छत्तीसगढ़ : ये कैसा विकास ? गरीब बच्चों को पढ़ाने के बाद भी नहीं मिले 5 करोड़ रूपए….
जांजगीर चांपा: शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्राइवेट स्कूलों में गरीब विद्यार्थियों की पढ़ाई के बदले स्कूल की सुविधा के अनुरूप फीस दी जाती है, मगर जिले में निजी स्कूल संचालकों को तीन साल से आरटीई की राशि नहीं मिली है।
यह राशि लगभग 5 करोड़ रूपए है। ऐसे में स्कूल संचालकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्र के छोटे स्कूलों की स्थिति और दयनीय है। कई स्कूल बंद होने के कगार पर है।
निजी स्कूलों के प्रारंभिक कक्षाओं में 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के विद्यार्थियों के लिए आरक्षित रखे जाने का प्रविधान शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत किया गया है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार पिछले शिक्षा सत्र में जिले के विभिन्न स्कूलों में सैकड़ों सीटें खाली रह गई थी। शिक्षा विभाग द्वारा प्रचार-प्रसार की कमी और अभिभावकों की उदासीनता के चलते ये सीटें खाली रह गई थी। इसके चलते जरूरतमंद विद्यार्थियों को इसका लाभ नहीं मिल पाया। विभिन्न ब्लाकों के गांवों के निजी स्कूलों में विद्यार्थी प्रवेश से वंचित तो हुए ही हैं जिला मुख्यालय में संचालित विभिन्न स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए रिक्त सैकड़ों सीटें खाली रह गईथी। इन सीटों में शहरी क्षेत्र के वर्ष 2007 के सर्वे सूची में शामिल तथा ग्रामीण क्षेत्र के वर्ष 2002 की सर्वे सूची में शामिल परिवार के बच्चों को निश्शुल्क प्रवेश स्कूलों के प्रांरभिक कक्षाओं में दिया जाना था। शिक्षा विभाग द्वारा विभिन्ना ब्लाकों में गरीब विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए आनलाइन आवेदन लिया जाता है। ज्ञात हो कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत सभी निजी स्कूलों के प्रांरभिक कक्षा पहली या नर्सरी में 25 फीसदी सीटों पर गरीब विद्यार्थियों को निश्शुल्क प्रवेश दिए जाने का प्रविधान है। इनकी फीस शासन द्वारा स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर दी जाती है।
रिक्त सीट से कम आवेदन आने पर सभी विद्यार्थियों को प्रवेश मिल जाता है। जबकि अधिक आवेदन होने पर लाटरी के माध्यम से विद्यार्थियों का चयन किया जाता है, लेकिन जिले के निजी स्कूल संचालक तीन साल से आरटीई की राशि नहीं मिलने से परेशान हैं। उनके स्कूलों में विद्यार्थियों को पढ़ाया गया। कई विद्यार्थी प्राइमरी व मिडिल से पढ़कर निकल भी गए, मगर अब तक उनकी फीस की राशि शासन से नहीं मिली है। स्कूल संचालकों को तीन सत्र का लगभग 5 करोड़ रूपए संचालकों को दिया जाना है। इनमें शिक्षा सत्र 2020-21 की राशि लगभग 70 फीसदी स्कूलों को नहीं मिली है जबकि शिक्षा सत्र 2021-22 में 10 प्रतिशत स्कूल आरटीई राशि से वंचित हैं। वहीं वर्ष2022-23 की राशि के लिए स्कूलों को मांग पत्र तक नहीं भेजा गया है। ऐसे में स्कूल संचालक परेशान हैं। स्कूल संचालकों का कहना हैकि निजी स्कूलों को हर माह शिक्षकों को वेतन देने सहित अन्य खर्च के लिए राशि की आवश्यकता होती है, मगर ये राशि तीन साल से नहीं मिलने से निजी स्कूल संचालक परेशान हैं।
सक्ती जिले में भी यही हाल
जिला सक्ती में भी निजी स्कूलों में गरीब विद्यार्थियों की भर्ती कराई गई है। शासन द्वारा उनकी फीस भी समय पर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय भेज दी जाती है, मगर यहां से स्कूलों को राशि देने में काफी नियमों का पेंच पुंसाया जाता है। इसके चलते स्कूल संचालकों को पिछले तीन साल की राशि अब तक नहीं मिली है। ऐसे में स्कूल संचालक डीईओ कार्यालय का चक्कर काटने को मजबूर हैं।
ये कैसा विकास-
एक तरफ सरकार यह दावा करते नहीं थकती है कि विकास के लिए रूपयों की कमी नहीं है, मगर निजी स्कूल संचालक तीन साल से राशि के लिए चक्कर काट रहे हैं। उन्हें शासन से आवंटन प्राप्त नहीं होने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है। स्कूल संचालक भी आरटीई की राशि नहीं मिलने से मायूस हैं।
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