हसौद। ग्राम अमोदा (हसौद) मे देवी पूजा किशोरी जी के व्यासत्व मे श्रीमद्भागवत कथा का रसपान करने आसपास के दर्जनों ग्राम से भक्तवत्सल बड़ी संख्या मे पधार रहे हैँ।कथा के पंचम दिवस मे क्षेत्रीय विधायक श्री केशव चंद्रा भी भगवान श्री कृष्ण की बाल-लीला का आनंद लेने कथा पंडाल मे पहुंचे। विदित हो श्री केशव चंद्रा स्वयं भागवत प्रेमी और दयालु स्वाभाव के व्यक्ति हैँ। पूज्या पूजा किशोरी जी ने भगवान कृष्ण की माखन चोरी और गोवर्धन पूजा की वात्सल्यमयी कथा से श्रोताओं के मन मे भगवान श्री कृष्ण की बालपन की अलौकिक छवि इंगित कर दी।


राक्षसों की शक्ति कम करने भगवान चुराते थे माखन – पूजा किशोरी जी
भगवान श्रीकृष्ण माखन चोर नहीं थे, वे माखन अधर्मियों को मिटाने के लिए चुराते थे।उन्होंने कहा कि बृज की गोपियां मथुरा में माखन बेचने जाती थीं। मथुरा के राक्षश दूध, दही और माखन का सेवन कर शक्तिशाली हो रहे थे। दूध दही और माखन नहीं मिलने से बृजवासी कमजोर हो रहे थे। राक्षसों की शक्ति कम करने और बृजवासियों की शक्ति बढ़ाने के लिए श्रीकृष्ण माखन चुराकर बृजवासियों को खिलाते थे।
कर्म का फल भगवान देते हैं –
देवी पूजा किशोरी ने कथा के माध्यम से बताया श्रीकृष्ण ने वृज वासियों से कहा कर्म का फल भगवान देते है और देवता चाह कर भी कर्म फल में परिवर्तन नहीं कर सकते है और न ही किसी को सुख दुःख दे सकते है। वर्षा होना तो प्रकति का नियम है भले ही इन्द्र को इसका स्वामी कहा गया हो। इन्द्र ऐश्वर्य में लिप्त हो गया है और उसे अहंकार हो गया है इसलिए प्रकति के खिलाफ जाकर प्रसन्नता अनुसार वर्षा कर रहा है और अपने आपको अज्ञानता के कारण त्रिलोकी का स्वामी मान बैठा है।
अगर पूजा करनी ही है तो इन्द्र की नहीं गोवर्धन की करनी चाहिए। फिर सभी गोप ग्वाल अपने अपने घरों से पकवान लाकर गोवर्धन की तराई में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से पूजन करने लगे। फिर श्री कृष्ण ने अपने को दूसरे रूप में प्रकट किया और सभी की गोवर्धन पूजा को स्वीकार किया। इन्द्र पूजा बंद करके गोवर्धन की पूजा ब्रजवासी कर रहे हैं, यह बात इन्द्र तक जब पहुँच गई तो इन्द्र घनघोर वर्षा करवाने लगा। ब्रजभूमि में मूसलाधार बरसात होने लगी। बाल ग्वाल भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचते ही उन्होंने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा। वही सबकी रक्षा करेंगे। श्रीकृष्ण का गोवर्धन धारण करना भागवत पुराण जब सब गोवर्धन पर्वत की तराई मे पहुँचे तो श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी को मूसलाधार हो रही वर्षा से बचाया। 07 दिन तक यह चमत्कार देखकर इन्द्रदेव को अपनी की हुई गलती पर पश्चाताप हुआ और वे श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित है।
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