सारंगढ़ अंचल मे अपनी पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनों ने निर्जला व्रत और चंद्रमा के दर्शन कर रखा करवा चौथ का व्रत….
सारंगढ़ । सुहागिनों का सबसे बड़ा व्रत करवा चौथ है। हिंदू धर्म में करवा चौथ का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। करवा चौथ पर निर्जला व्रत और चंद्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देने का खास महत्व होता है। इस बार करवा चौथ बहुत ही शुभ में है ।करवा चौथ की पूजा और कथा सुनने के बाद अब सुहागिन महिलाओं को चांद के निकलने का बेसब्री से इंतजार करते हैं । करवा चौथ पर शुभ मुहूर्त में करवा माता की पूजा,आरती और कथा सुनी जाती है। फिर इसके बाद चांद के निकलने का इंतजार किया जाता है और चंद्रमा के दर्शन करते हुए अर्घ्य देकर व्रत पूरा करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पति की लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना के लिए महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं । किसी भी पूजा में अगर मंत्रों का जाप किया जाय तो पूजा अवश्य ही सफल होती है। मंत्रों के जाप से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। करवा चौथ पर भगवान शिव-माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा करने का विधान होता है।
करवा चौथ पूजा में दीपक और छलनी का महत्व
करवा चौथ व्रत में दीपक और छलनी के बिना पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। करवा चौथ की पूजा में दीपक और छलनी का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और दीपक जलाने से नकारात्मकता दूर होती है एवं पूजा में ध्यान केंद्रित होता है , जिससे एकाग्रता बढ़ती है। करवा चौथ पर महिलाएं छलनी में दीपक रखकर चांद को देखती हैं और फिर पति का चेहरा देखती हैं। इसकी वजह करवा चौथ में सुनाई जाने वाली वीरवती की कथा से जुड़ा हुआ है। बहन वीरवती को भूखा देख उसके भाइयों ने चांद निकलने से पहले एक पेड़ की आड़ में छलनी में दीप रखकर चांद बनाया और बहन का व्रत खुलवाया ।

करवा चौथ पर चांद और पति को छलनी से क्यों देखा जाता है?
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान गणेश के सिर को भगवान शिव ने काटा था और फिर हाथी के बच्चे का सिर लगाकर उन्हें दोबारा से जीवित किया था। सभी देवी-देवता भगवान गणेश के इस रूप को देखकर उनकी पूजा-आराधना की थी लेकिन चंद्रदेव को अपनी सुंदरता पर बड़ा घमंड था और गणेश जी के स्वरूप को देखकर उनका परिहास किया था। तब गणेश जी ने चंद्रदेव को छय रोग का श्राप दिया था और चतु्र्थी तिथि पर चंद्रमा को देखने पर दोष लगेगा। इस कारण से चांद को सीधे नहीं देखा जाता है बल्कि छलनी का प्रयोग करके चांद के दर्शन किया जाता है।
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