सारंगढ़। जिले में शिक्षा का व्यवसायिक तंत्र इस कदर हावी हो चुका है कि अभिभावकों की जेब काटने के साथ-साथ उच्च शिक्षित युवाओं के श्रम का अमानवीय शोषण खुलेआम जारी है। हर गली-मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे प्राइवेट स्कूल अब ज्ञान के मंदिर कम और आधुनिक ‘श्रम शोषण केंद्र’ ज्यादा नजर आ रहे हैं।

योग्यता के आधार पर युवाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देने के बजाय प्रबंधन उन्हें महज 5,000 से 8,000 रुपये के अल्प मानदेय पर खटा रहा है जो कि श्रम विभाग द्वारा तय कुशल मजदूर की वैधानिक दैनिक मजदूरी दर से भी काफी नीचे है।
ऑल-इन-वन मजदूर बने शिक्षक –
सरकारी नियमों के अनुसार निर्धारित न्यूनतम वेतन अधिनियम को ताक पर रखकर निजी स्कूल संचालक युवाओं की बेरोजगारी की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। शिक्षकों से सिर्फ अध्यापन ही नहीं, बल्कि क्लर्क, दफ्तरी, चपरासी, प्रचारक और दाखिला एजेंट तक का काम लिया जा रहा है। विरोध की स्थिति में बिना किसी पूर्व सूचना या विधिक प्रक्रिया के सीधे सेवा समाप्ति का फरमान थमा दिया जाता है।
विशाखा गाइडलाइन और महिला सुरक्षा कानूनों की घोर उपेक्षा-
सबसे चिंताजनक पहलू महिला शिक्षिकाओं की सुरक्षा और कार्यस्थल की गरिमा का है। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक ‘विशाखा दिशा-निर्देशों’ और कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न रोकथाम, निषेध एवं निवारण अधिनियम, 2013 के तहत 10 से अधिक कर्मचारियों वाले हर संस्थान में ‘आंतरिक शिकायत समिति’ का गठन अनिवार्य है। जिले के अधिकांश निजी स्कूलों में यह वैधानिक समिति कागजों पर भी दर्ज नहीं है। इतना ही नहीं, मातृत्व अवकाश और अनिवार्य शासकीय अवकाशों को भी प्रबंधन की मनमर्जी से काट दिया जाता है।
सुरक्षा नहीं, जासूसी का जरिया बने सीसीटीवी?
स्कूल परिसरों में लगे सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल सुरक्षा मानकों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
शिकायतों की माने तो स्टाफ रूम में आपसी बातचीत तक पर रोक लगा दी गई है, जो सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(c) का खुला उल्लंघन है।
6 से 8 घंटे के कार्यदिवस में शिक्षकों को कक्षाओं में बैठने तक की अनुमति नहीं है! कई स्कूलों में क्लासरूम से कुर्सियां जानबूझकर हटा दी गई हैं। मानवीय गरिमा के साथ काम करने का अधिकार अनुच्छेद 21 निजी प्रबंधकों के अहंकार की भेंट चढ़ चुका है।
प्रशासनिक मिलीभगत या उदासीनता?
स्कूलों के खातों से होने वाले संदिग्ध लेन-देन, शिक्षकों के खातों में जमा की जाने वाली वास्तविक राशि और रजिस्टर पर दर्ज आंकड़ों का मिलान यदि श्रम विभाग और जिला शिक्षा विभाग संयुक्त रूप से करे, तो बड़े आर्थिक व कानूनी घोटाले की पुष्टि हो सकती है।
पीड़ित शिक्षकों ने जिला प्रशासन, श्रम आयुक्त और जिला शिक्षा अधिकारी से मांग की है कि जिले के सभी निजी स्कूलों में न्यूनतम वेतन अधिनियम के अनुपालन की जांच बैंक स्टेटमेंट के जरिए हो।
कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत समिति (विशाखा गाइडलाइन) के गठन की भौतिक पुष्टि की जाए।
मनमाने कार्य-घंटों और गैर-शैक्षणिक कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए।
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