बरमकेला।
कहते हैं ‘पानी ही जीवन है’, लेकिन बरमकेला में जल आवर्धन योजना के तहत पाइपलाइन बिछाने के नाम पर जो सड़कों का ‘कायाकल्प’ हुआ है, उसे देखकर तो यही लगता है कि पानी बाद में मिलेगा, कमर का दर्द पहले!
लाखों-करोड़ों का बजट ठिकाने लगाकर नल-जल का सपना तो दिखा दिया गया, मगर जिस सड़क की छाती चीरकर पाइप गाड़े गए थे, उसकी मरम्मत ऐसी “उच्च कोटि” की हुई कि महज चार महीनों में ही सड़क ने दम तोड़ दिया।
ताजा नजारा तो और भी दिलचस्प है जिसमें सड़क की उखड़ी हुई परतों और धंसे हुए गड्ढों में एक भारी-भरकम टैंकर का पहिया ऐसा फंसा, मानो सड़क ने खुद ही उसे रोककर अपनी बदहाली की दास्तान सुनाने की ठान ली हो। गनीमत रही कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ और किसी की जान पर नहीं बनी, वरना साहब लोग ‘जांच कमेटी’ का ड्रामा रचने में व्यस्त हो जाते।
यह कोई अचानक आई आपदा नहीं है। करीब एक महीने पहले मीडिया ने चेताया था कि घटिया निर्माण के कारण सड़क किसी भी दिन बड़ा हादसा करवा सकती है। लेकिन हमारे जिम्मेदार महकमे की नींद इतनी गहरी है कि जब तक कोई टैंकर या गाड़ी सड़क में समा न जाए, तब तक कागजी फाइलों में ‘सब चंगा सी’ ही रहता है।
नोटिस-नोटिस का खेल, नतीजा ठन-ठन गोपाल-
इधर नगर पंचायत भी अपनी जिम्मेदारी का पल्ला झाड़ने में पीछे नहीं है। मुख्य नगरपालिका अधिकारी दीपक विश्वकर्मा जी का कहना है कि उन्होंने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) को मौखिक और 24 जुलाई को बाकायदा लिखित नोटिस थमाया था। मगर साहब, सरकारी विभागों में ‘एक हाथ से नोटिस दो, दूसरे हाथ से रद्दी में डालो’ का खेल नया थोड़े ही है! PHE विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
मरम्मत का पैचवर्क या जनता के पैसे की होली?-
नगरवासियों का सीधा सवाल है कि जब जनता का गाढ़ा पसीना टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जाता है, तो निर्माण कार्य का यह ठेका किस गुणवत्ता की शर्त पर दिया जाता है? क्या चार महीने में उखड़ने वाली सड़कें ही आज का ‘विकास’ हैं? हर बार गड्ढा खोदो, डामर का लेप लगाओ और पहली ही बारिश में सब बह जाने दो।
अब देखना यह है कि टैंकर फंसने के इस ‘लाइव डेमो’ के बाद भी अफसरों की तंद्रा टूटती है या फिर किसी बड़े हादसे के इंतजार में एक और नोटिस का कागज तैयार किया जाता है!

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