भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं, चमत्कार और अनसुलझे रहस्य लोगों को हैरान कर देते हैं. कहीं मंदिरों की वास्तुकला वैज्ञानिकों को चुनौती देती है, तो कहीं वहां होने वाली घटनाएं तर्क से परे नजर आती हैं.

इनमें कुछ मंदिर वास्तव में ऐसे हैं, जिनके बारे में सुनने के बाद इन्हें करीब से देखने और जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है. ऐसा ही भगवान श्रीराम का एक रहस्यमयी मंदिर बुंदेलखंड के छतरपुर में स्थित है. इस मंदिर में भगवान राम धनुष बाण लिए अकेले विराजमान हैं. इस प्राचीन मंदिर को लोग आजानुभुज मंदिर के नाम से जानते हैं. शायद दुनिया का इकलौता मंदिर होगा, जिसमें भगवान राम आजानुभुज रूप में अकेले विराजे हैं. मंदिर में गद्दी पर सिर्फ भगवान राम हाथों में धनुष बाण लिए सिंहासन में बैठे हुए हैं.
बता दें कि, छतरपुर शहर के महोबा रोड पर एक प्राचीन पहाड़ी है. उस पहाड़ी को लोग जनराय टौरिया के नाम से जानते हैं. यहां राम जी का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जो 600 साल से भी ज्यादा पुराना है. इस मंदिर का नाता त्रेता युग से जुड़ा हुआ है. यहां दूर दूर से लोग दर्शन करने आते हैं. पौराणिक मान्यता है कि, यहां भगवान राम ने क्रोधित होकर अपनी भुजाओं को यहीं पर फैलाया था. भगवान का यह क्रोधित रूप आजानुबाहु या आजानुभुज कहलाया.
किस महंत ने स्थापित कराया यह मंदिर
जानकारी के अनुसार, ‘प्राचीन समय में मंदिर के महंत गोस्वामी तुलसीदास जी के काका गुरु हरदास देवदास जी हुआ करते थे. एक दिन उनके स्वप्न में भगवान राम आए और पहाड़ में खुद की एक प्रतिमा होने के संकेत दिए. इसके बाद गुरु जी तड़के पहाड़ पर पहुंचे. वहां उन्हें भगवान की एक मूर्ति मिली, जिसकी भुजाएं लंबी थीं. इसके बाद गुरु जी ने मंदिर की स्थापना कराकर भगवान राम की प्रतिमा स्थापित कराई. इसी मंदिर में भगवान राम आजानुभुज रूप में अकेले विराजमान हैं. भगवान की भुजाएं लंबी होने के कारण यह मंदिर आजानुभुज मंदिर के नाम से जाना गया.
क्यों पड़ा इस मंदिर का नाम आजानुभुज
पौराणिक कथा के अनुसार, वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पन्ना क्षेत्र स्थित सुतीक्षण ऋषि के आश्रम में कुछ समय के लिए ठहरे थे. आश्रम से आगे बढ़ते समय श्रीराम की नजर रास्ते में पड़ी हड्डियों के विशाल ढेर पर गई. भगवान राम के पूछने पर संतों ने बताया कि ये हड्डियां उन साधु-संतों की हैं, जिन्हें राक्षसों ने अत्याचारपूर्वक मार डाला था. निर्दोष ऋषियों की यह दर्दनाक कहानी सुनते ही भगवान राम का हृदय क्रोध से भर उठा. कहा जाता है कि, उसी क्षण उन्होंने अपनी लंबी भुजाएं फैलाकर संकल्प लिया कि वे इस धरती को राक्षसों के आतंक से मुक्त करेंगे और धर्म की रक्षा करेंगे. भगवान राम के इसी तेजस्वी, संकल्पवान और क्रोधपूर्ण स्वरूप को ‘आजानुबाहु’ या ‘आजानुभुज’ कहा जाता है. मान्यता है कि इसी ऐतिहासिक-पौराणिक प्रसंग की स्मृति में इस मंदिर का नाम आजानुभुज मंदिर पड़ा.
रामायण में भी है आजानुभुज मंदिर का जिक्र
ऐतिहासिक और प्राचीन आजानभुज मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा हुआ है. इस प्राचीन मंदिर का जिक्र रामायण में भी आता है. कहा जाता है कि, जब भगवान श्री राम वनवास काट रहे थे, उस समय कुछ साल उन्होंने बुंदेलखंड में भी बिताए. भगवान श्री राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ छतरपुर और पन्ना जिले में भी रहकर अपना वनवास काटा है. उसी समय त्रेतायुग में बुंदेलखंड इलाके में खर दूषण नाम के राक्षसों का आतंक चरम पर था, उनके आतंक को देखते हुए भगवान राम ने उनका संहार किया था.
श्रीराम ने आजानुभुज रूप में खर-दूषण का वध किया
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने जब खर-दूषण राक्षस का वध किया था, तब उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा कि तुम सीता को लेकर कंदर गिर की ओर जाओ. मैं यहां निशाचर का वध करता हूं. इसके बाद राम जी ने अकेले ही खर-दूषण जैसे तमाम राक्षसों का वध किया. इसके बाद देवताओं का भ्रम टूटा और उन्होंने भगवान राम की वंदना की. भगवान राम ने खर-दूषण के वध के लिए आजानुभुज रूप धारण किया था. इसलिए यहां राम जी अकेले विराजमान हैं.
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