सारंगढ़। अपराध जांच को और अधिक सटीक व वैज्ञानिक बनाने की दिशा में बिलासपुर रेंज पुलिस ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए डीएनए एवं जैविक/भौतिक साक्ष्य संकलन व परीक्षण विषय पर रेंज स्तरीय एक दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यशाला पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग के मार्गदर्शन में आयोजित हुई, जिसमें रेंज के सभी जिलों से लगभग 200 पुलिस अधिकारी व कर्मचारी जुड़े।
कार्यक्रम का शुभारंभ पुलिस महानिरीक्षक श्री गर्ग द्वारा किया गया। इस दौरान वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुंगेली भोजराम पटेल एवं उप पुलिस अधीक्षक विवेक शर्मा की विशेष उपस्थिति रही।

जांच में छोटी गलती, अपराधी को बड़ा फायदा

कार्यशाला में बताया गया कि हत्या, हत्या के प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में डीएनए साक्ष्य बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन अक्सर साक्ष्य संग्रहण के दौरान छोटी-छोटी प्रक्रियात्मक त्रुटियां हो जाती हैं, जिससे जांच रिपोर्ट कमजोर हो जाती है और आरोपी को न्यायालय से लाभ मिल जाता है।
“डीएनए — न्याय का ब्लूप्रिंट”
क्षेत्रीय विज्ञान प्रयोगशाला बिलासपुर की वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. प्रियंका लकड़ा ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से डीएनए की महत्ता को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि—
डीएनए को “न्याय का ब्लूप्रिंट” कहा जाता है
99.9% डीएनए सभी में समान होता है, लेकिन 0.1% भिन्नता से व्यक्ति की पहचान संभव होती है
रक्त, लार, वीर्य, बाल, हड्डी, दांत और टच डीएनए जैसे साक्ष्य जांच में उपयोगी होते हैं
उन्होंने यह भी बताया कि निर्भया केस, तंदूर हत्याकांड और श्रद्धा वाकर केस जैसे चर्चित मामलों में डीएनए साक्ष्य निर्णायक साबित हुए।
न्यायालयिक जीव विज्ञान की अहम भूमिका
डॉ. स्वाति कुजूर ने न्यायालयिक जीव विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अपराध स्थल से प्राप्त जैविक नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण कर यह पता लगाया जाता है कि नमूना मानव का है या किसी अन्य जीव का। साथ ही, मृत्यु के समय व कारण का निर्धारण करने में भी यह विज्ञान सहायक होता है।
साक्ष्य संरक्षण पर विशेष जोर
कार्यशाला में यह भी स्पष्ट किया गया कि—
डीएनए साक्ष्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं
नमी, गर्मी और बैक्टीरिया इन्हें नष्ट कर सकते हैं
साक्ष्यों को प्लास्टिक के बजाय कागज के बैग में रखना चाहिए
“चेन ऑफ कस्टडी” का पालन कानूनी रूप से अनिवार्य है
सवाल-जवाब में मिला समाधान
प्रशिक्षण के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित हुआ, जिसमें अधिकारियों ने विवेचना के दौरान आने वाली व्यावहारिक समस्याएं रखीं। वैज्ञानिक अधिकारियों ने इनका समाधान करते हुए साक्ष्य संकलन की सही प्रक्रिया समझाई।
प्रशिक्षकों का सम्मान
कार्यक्रम के अंत में पुलिस महानिरीक्षक श्री गर्ग द्वारा डॉ. प्रियंका लकड़ा एवं डॉ. स्वाति कुजूर को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
निष्कर्षतः, यह कार्यशाला पुलिस विवेचना को वैज्ञानिक आधार देने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी, जिससे अपराधियों को सजा दिलाने और निर्दोषों को न्याय दिलाने में और मजबूती आएगी।
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