शास्त्रों में आत्मघात को बताया महापाप..उत्तररामचरित के माध्यम से डॉ. गौतमसिंह ने दी चेतावनी..’अंधतामिस्र’ नरक में मिलता है स्थान..
सारंगढ़ : वर्तमान समय में बढ़ते मानसिक तनाव और अवसाद के बीच भारतीय दर्शन और संस्कृत साहित्य की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. गौतमसिंह पटेल ने महाकवि भवभूति विरचित ‘उत्तररामचरित’ के श्लोकों का संदर्भ देते हुए समाज को आत्म हत्या के भयानक आध्यात्मिक और नैतिक दुष्परिणामों के प्रति सचेत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में जीवन को ईश्वरीय धरोहर माना गया है और इसका अंत करना आत्मा के विरुद्ध विद्रोह है।
’अंधतामिस्र’ लोक: जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुँचता
डॉ. पटेल ने उत्तररामचरित (4/9) के श्लोक की व्याख्या करते हुए बताया कि ऋषियों के मतानुसार, आत्मघात करने वालों को ‘अंधतामिस्र’ नामक लोक प्राप्त होता है। यह स्थान गाढ़े अंधकार से भरा हुआ और सूर्य की रोशनी से रहित है। गरुड़ पुराण में वर्णित 28 नरकों में इसे प्रधान माना गया है, जहाँ पापी जीव जड़ से कटे वृक्ष की भांति चेतना शून्य होकर अनंत यातनाएं सहता है।
धार्मिक ग्रंथों की कड़ी चेतावनी-
लेख में विभिन्न शास्त्रों के प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं
मनुस्मृति: आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को ‘जलांजलि’ (तर्पण) देने तक का निषेध है। इसे ब्रह्महत्या के तुल्य पाप माना गया है।
गरुड़ पुराण: आत्मघाती को प्रेतयोनि प्राप्त होती है, जहाँ वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर भटकता रहता है।
श्रीमद्भागवत: इसमें भी उस घोर नरक का वर्णन है जहाँ व्यक्ति अपनी सुध-बुध खोकर असहनीय व्यथा झेलता है।
आधुनिक युग में मानसिक स्वास्थ्य का संदेश-
डॉ. गौतमसिंह पटेल का यह आलेख केवल धार्मिक व्याख्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक जागरूकता का संदेश भी है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जहाँ मानसिक स्वास्थ्य संकट बढ़ रहा है, वहाँ भारतीय दर्शन हमें धैर्य, भक्ति और कर्मयोग का मार्ग दिखाता है। विपत्ति के समय जीवन का अंत करना समाधान नहीं, बल्कि कष्टों के नए चक्र की शुरुआत है।
शास्त्रों का सार यही है कि जीवन पवित्र है। इसे ईश्वर की अमानत समझकर संरक्षित करना चाहिए। नैतिक उत्थान और शास्त्र सम्मत आचरण ही हमें ऐसे महापापों से बचा सकता है।
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