वन विभाग की नाक के नीचे आरक्षित वन में खड़ा कर दिया पुल, सोता रहा प्रशासन!

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​सारंगढ़। जिले में नियमों को ठेंगा दिखाने का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसने शासन-प्रशासन की साख पर कालिख पोत दी है। आरक्षित वन क्षेत्र सर्किल गाताडीह और बेलाडुला (कक्ष क्रमांक 433) में बिना किसी वैधानिक अनुमति के ‘लॉन्ग स्पैन ब्रिज’ (LSB) का निर्माण शुरू कर दिया गया है। विकास की अंधी दौड़ में वन संरक्षण अधिनियम (FCA 1980) को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया है।

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नियमों की बलि चढ़ा रहा MMGSVY और ठेकेदार का गठजोड़-

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​आरक्षित वन क्षेत्र में परिंदा भी पर मारता है तो वन विभाग की अनुमति अनिवार्य होती है, लेकिन यहाँ तो कार्य एजेंसी MMGSVY और ठेकेदार रोहित केजरीवाल ने मिलकर पूरा का पूरा पुल ही खड़ा करना शुरू कर दिया। बिना FCA क्लीयरेंस के निर्माण कार्य यह साबित करता है कि जिले में भू-माफिया और निर्माण एजेंसियों के मन में न तो कानून का खौफ है और न ही पर्यावरण के प्रति कोई संवेदना।

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सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं रही लूट, अब जमीन पर कब्जा!

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​अब तक वनों में केवल लकड़ी चोरी और पेड़ों की कटाई की खबरें आती थीं, लेकिन सारंगढ़ जिला एक कदम आगे निकल गया है। यहाँ तो अब सीधे आरक्षित वन की भूमि पर अवैध निर्माण का नया खेल शुरू हो गया है। सूत्रों की मानें तो इससे पहले प्रधानमंत्री आवास के नाम पर भी वन भूमि दबाने की कोशिश हुई थी। हाल ही में बिजली विभाग ने 50 से अधिक पेड़ काटकर अपनी ‘मर्जी’ चलाई थी, और अब पुल निर्माण ने सारी हदें पार कर दी हैं।

वन विभाग की भूमिका पर उठते संगीन सवाल-

​हैरानी की बात यह है कि आरक्षित वन क्षेत्र में इतना बड़ा निर्माण कार्य हो रहा है और वन विभाग के जमीनी अमले को इसकी भनक तक नहीं लगी? या फिर अधिकारियों ने अपनी आंखें जानबूझकर मूंद ली हैं? बिजली विभाग पर वसूली की खानापूर्ति करने वाला वन विभाग इस ‘अवैध पुल’ पर क्या कार्रवाई करेगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

विकास की आड़ में पर्यावरण का ‘मर्डर’-

​स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है। नागरिकों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन कानूनों की धज्जियां उड़ाकर और जंगलों को तबाह कर किया गया निर्माण ‘विकास’ नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी के साथ ‘धोखा’ है। क्या ठेकेदार और एजेंसी इतने ताकतवर हैं कि उन्हें किसी भी अधिनियम की परवाह नहीं है?

तीखा सवाल:-

क्या जिले के कलेक्टर और वनमंडलाधिकारी (DFO) इस अवैध निर्माण को ध्वस्त करवाएंगे, या फिर कागजी कार्रवाई की लीपापोती कर माफिया को संरक्षण दिया जाएगा?

खनिज एवं वन विभाग के अधिकारियों से जनता का सवाल-

​सजगता पर सवाल:

कक्ष क्रमांक 433 एक आरक्षित वन क्षेत्र है। यहाँ ईंट-सीमेंट का इतना भारी निर्माण शुरू हो गया और आपके बीट गार्ड से लेकर रेंजर तक को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या विभाग सो रहा था या जानबूझकर आँखें मूंद रखी थीं?

FCA 1980 का उल्लंघन:

वन संरक्षण अधिनियम (FCA) 1980 के तहत बिना केंद्र/राज्य की मंजूरी के पत्ता भी नहीं हिल सकता, फिर यहाँ बिना अनुमति ‘लॉन्ग स्पैन ब्रिज’ (LSB) का ढांचा कैसे खड़ा हो गया?

मिलीभगत की आशंका:

बिजली विभाग द्वारा 50 पेड़ काटने पर आपने सिर्फ ‘वसूली’ कर मामला रफा-दफा कर दिया। क्या इसी ढुलमुल रवैये के कारण ठेकेदारों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे अब सीधे जंगल की जमीन कब्जा रहे हैं?

दंडात्मक कार्रवाई:

क्या विभाग केवल नोटिस देने की औपचारिकता निभाएगा या इस अवैध निर्माण को ध्वस्त कर संबंधित ठेकेदार और एजेंसी पर FIR दर्ज कराएगा?

जिम्मेदारी तय करना:

इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार वनपाल (Forester) और परिक्षेत्र अधिकारी (RO) पर अब तक क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है?

​कार्य एजेंसी (MMGSVY) और ठेकेदार के लिए सवाल
​अनुमति का आधार: ठेकेदार रोहित केजरीवाल और MMGSVY ने किस आधार पर आरक्षित वन क्षेत्र में काम शुरू किया? क्या उनके पास वन विभाग का ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) है? यदि नहीं, तो यह सीधे तौर पर कानून को चुनौती क्यों न मानी जाए?

सरकारी धन का दुरुपयोग:

अवैध स्थान पर पुल बनाकर सरकारी पैसे की बर्बादी क्यों की जा रही है? यदि कल को वन विभाग इस निर्माण को अवैध घोषित कर तोड़ देता है, तो जनता के टैक्स के इस पैसे की भरपाई कौन करेगा?
​नियमों की जानकारी: क्या एक अनुभवी ठेकेदार और सरकारी एजेंसी को यह नहीं पता कि आरक्षित वन क्षेत्र (Reserved Forest) में निर्माण के नियम क्या हैं? या फिर “काम शुरू कर दो, बाद में मैनेज कर लेंगे” वाली नीति अपनाई जा रही है।

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