छत्तीसगढ़:पत्नी ने तलाक लेने के लिए पति को बता दिया नपुंसक, हाई कोर्ट ने माना क्रूरता…

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बिलासपुर: विवाह के महज चार साल बाद ही पति पत्नी के संबंधों में ऐसी दरार आई कि दोनों अलग-अलग रहने लगे। अलग रहने के सात साल बाद पति ने परिवार न्यायालय में विवाह विच्छेद को लेकर याचिका दायर की।

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मामले की सुनवाइ के दौरान पत्नी ने पति पर गंभीर आरोप लगा दिया। बिना मेडिकल रिपोर्ट के पत्नी ने फेमिली कोर्ट में अपने पति को नपुंसक होने का आरोप लगाया।

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मामले की सुनवाई के बाद फेमिली कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। परिवार न्यायलय के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने पति की याचिका को मंजूर करते हुए तलाक का आदेश जारी कर दिया है।

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मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पत्नी के आरोप के संबंध में कहा कि बिना मेडिकल रिपोर्ट के नपुसंकता का गंभीर आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की निशानी है और यह इसी श्रेणी में आता है। कोर्ट ने इस कड़ी टिप्पणी के साथ पति की याचिका को स्वीकार करते हुए तलाक की मंजूरी दे दी है।

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जांजगीर-चांपा निवासी युवक की दो जून 2013 को बलरामपुर जिले में रहने वाली युवती से हुई थी। विवाह के दौरान शिक्षा कर्मी पति बैकुंठपुर चर्चा कालरी में नौकरी कर रहा था। पत्नी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर काम कर रही है।

विवाह के कुछ महीने बाद पत्नी पति पर तबादला करवाने का दबाव बनाने लगी। वह जहां नौकरी रही है, वहीं या आसपास तबादला कराने के लिए कहने लगी। स्थानांतरण न होने की स्थिति में नौकरी छोड़ने के लिए दबाव बना रही थी। आपसी विवाद और संवादहीनता के चलते 2017 से दोनों अलग-अलग रहने लगे।

पत्नी ने लगाए गंभीर आरोप

इस बीच दोनों की बातचीत भी बंद हो गई। अलगाव के सात साल बाद 2022 में पति ने फेमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद के लिए याचिका दायर की। फेमिली कोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी ने पति पर गंभीर आरोप लगा दिया। यौन संबंध बनाने में अक्षम होने की जानकारी देते हुए नपुंसक होने का आरोप मढ़ दिया।

कोर्ट में उसने यह भी स्वीकार किया कि आरोप की पुष्टि के लिए उसके पास मेडिकल रिपोर्ट जैसे वैधानिक कोई दस्तावेज नहीं है। इस आरोप के जवाब में पति ने बताया कि इसके पहले जब पत्नी ने विवाद किया तब उस पर पड़ोस की महिला के साथ अवैध संबंध के आरोप लगाई थी।

हाई कोर्ट ने की कड़ी टिप्पणी, कहा- यह मानिसक प्रताड़ना है

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने लिखा है कि किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाणिकता के नपुंसकता जैसे गंभीर आरोप लगाना मानसिक क्रूरता से कम नहीं है। इस तरह के आरोप से मान सम्मान को तो धक्का पहुंचता ही है संबंधित व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बेहद बुरा असर पड़ता है।

हाई कोर्ट ने फेमिली कोर्ट के फैसले को गंभीर त्रुटिपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया है। पति ने पत्नी के खिलाफ क्रूरता और विवाह विच्छेद के आरोप को सिद्ध कर दिया है। लिहाजा वैवाहिक संबंध को बनाए रखना न्याय और विधि के अनुरुप नहीं होगा। इस टिप्पणी के साथ पति की याचिका को स्वीकार करते हुए तलाक की मंजूरी दे दी है।

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