सारंगढ़ मे ऐतिहासिक रहा छेरछेरा का त्यौहार, अमीर – गरीब, छोटे-बड़े सबने कहा “कोठी के धान ल हेरा”…. शहर, गाँव, दुकान, दफ्तर से लेकर पुलिस थानों तक मे मनाया गया पावन पर्व….
सारंगढ़। छेरछेरा त्यौहार छत्तीसगढ़ का लोक परम्परागत त्यौहार है। जनवरी माह में, हिंदी के पुस पुन्नी त्योहार छेरछेरा के रूप में मनाया जाता है त्योहार के पहले घर की साफ सफाई की जाती है। छग में धान कटाई , मिसाई के बाद यह त्यौहार को मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध त्योहार है, जो अन्न सुरक्षा, मेल मिलाप का त्यौहार है किसान धान को मिसकर सुरक्षित अपने घर में रख लेता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक घर घर जाकर छेरछेरा मांगा करते है । धान या अन्न दान किया जाता है। अमीर गरीब सभी के घर जाकर छेरछेरा मांगा जाता है । यह दिन समानता का दिन होता है। इस दिन कोई अमीर गरीब व कोई छुआछूत नहीं होता है । इस वाक्य को सभी घर में बोलते हैं छेरछेरा कोठी के धान हेरत हेरा।
गांव से ताल्लकात रखने वाले थाना प्रभारी श्री विजय चौधरी ने बताया कि – छेरी शब्द छे अरी से मिलकर बना है। मनुष्य के छह शत्रु होते हैं , काम, क्रोध ,लोभ, मोह, तृष्णा और अहंकार बच्चे जब कहते हैं छेरिक छेरा छेर बरतनीन छेरी छेरा इसका अर्थ है कि – हे बरतनीन माई हम आपक द्वार आय है। माई कोठी के धान को देकर हमारे दुख ब दरिद्रता को दूर कीजिए।
सारंगढ़ थाना मे भी छेर छेरा मांगने गए मासूम –
शहर ,गाँव के साथ छेर छेरा त्यौहार का खुमार कोतवाली मे भी देखा गया। जहाँ मासूम बच्चे बिना खाकी के भय के बेधड़क थाने मे घुसकर छेरछेरा माँगने पहुंच गये। जहाँ वर्दीधारियों ने खुद के जेब से बच्चों को यथा सम्भव दान कर चेहरे मे मुस्कान लाने की हर सम्भव कोशिस किए।
छत्तीसगढ़ की दानशीलता जगजाहिर है – एस पी राजेश कुकरेजा
ग्रामीण जीवन में रचे , बसे, पले , बढ़े पुलिस अधीक्षक ने बताया कि – छत्तीसगढ़ की दान शीलता जगजाहिर है। यहां के लोग स्वयं भूखे रह कर अतिथि और अभ्यागत की सेवा करते हैं। संतोष इनक जीवन का प्रमुख गुण है। श्रम के साथ साथ संतोषी स्वभाव इनका आभूषण है। इसीलिए यह सहज और सरल है। छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया की उक्ति इनके इसी गुण के कारण चल पड़ी है।
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