किसी को रुपये पसंद हैं। रुपयों की बचत करने से जरूरी काम होते हैं, लेकिन रुपये संजोकर आप मालामाल हो सकते हैं। यकीन नहीं है तो गोमतीनगर के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान आइए।

संस्थान में भारतीय मुद्रा परिषद के 104वें वार्षिक सम्मेलन के साथ मुद्रा मेला लगा है। जहां रुपयों का संसार निहारने बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे व लोग पहुंच रहे हैं। दिल्ली के राहुल कौशिक के स्टाल पर 1922 का पांच रुपये का नोट है, ये यूनीफेस यानी नोट का एक चेहरा होने से आकर्षण का केंद्र है, कीमत करीब 35 हजार रुपये है। कौशिक ने जार्ज पंचम, जार्ज षष्टम से लेकर अब तक के हर तरह के नोट प्रदर्शित किए हैं। इसी तरह 10, 350, 500, 550 व 1000 रुपये के सिक्के भी यहां आकर्षण का केंद्र हैं।

लखनऊ के अशोक कुमार के स्टाल पर ब्रिटिश काल का एक रुपये का नोट दस लाख का है। हज पर जाने वालों को मिलने वाला 10 का नोट छह लाख और अरब सागर के आसपास के देशों के लिए नारंगी रंग के एक, पांच व दस के नोट डेढ़-डेढ़ लाख रुपयों के हैं। उन्होंने दो, पांच व 20 रुपये के शुरुआती भारतीय नोट भी संजो रखे हैं, तो ब्रिटिश काल का 50 रुपये के नोट का भाव आठ लाख रुपये है।
49 मिलीग्राम व 10 लाख मिलीग्राम का सिक्का
प्रदर्शनी में 49 मिलीग्राम का सोने का सिक्का विजय नगर साम्राज्य का है। इसी के बगल में 10 लाख मिलीग्राम यानी एक किलोग्राम का चांदी का सिक्का भी है। अशोक ने 1950 में एक पैसा से लेकर एक रुपये तक के 35 सिक्के लगा रखे हैं। इनके पास कई दुर्लभ नंबर वाले नोटों की गड्डियां भी हैं।
नोटों में फिबोनाची श्रृंखला
इटली के गणितज्ञ लियोनार्डो पिसानो फिबोनाची संख्या सिद्धांतकार थे। उनके संख्या अनुक्रम को फिबोनाची श्रृंखला कहा जाता है। इसमें एक, दो, तीन, पांच, आठ, 13 …. आदि हैं। यानी अगली संख्या पिछली दो संख्याओं का जोड़ है। देश में नोट दस लाख की संख्या में छपता है, इसलिए इस श्रृंखला में 29 नोट हो सकते हैं। पहली गड्डी में 14 नोट मिलते हैं, जबकि शेष 9999 गड्डियों में 19 नोट मिलते हैं। प्रदर्शनी में पूरी श्रृंखला संजोई गई है।
जीवों पर दया करो
मऊ जिले के श्रीराम जायसवाल ने जीवों पर दया करो स्लोगन से विविध देशों के सिक्के लगा रखा है। उन पर हाथी, घोड़ा व अन्य जीव जंतुओं के चिह्न बने हैं। देश की 81 रियासतों के भी सिक्के उनकी स्टाल पर सजे हैं।
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