सनातन धर्म में चातुर्मास को स्नान-दान, पूजा-पाठ, जप, तप और साधना आदि का समय माना गया है. इन कामों को करने से अध्यात्मिक शुद्धि होती है. इस समय जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं.

इसको देवताओं के शयनकाल का समय माना जाता है. मान्यता है कि चातुर्मास में किया गया पूजा-पाठ, जप, तप और साधना सर्वोत्तम फल प्रदान करती है. हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी के दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है.
इसका समापन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी के दिन होता है. माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं. इस साल 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी है. इसी दिन चातुर्मास शुरू हो जाएगा. फिर 120 दिनों तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहेंगे. वो 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन योगनिद्रा से जागेंगे. चातुर्मास में सांसारिक सुखों से दूर रहने की सलाह दी जाती है. इस दौरान शादी-विवाह नहीं होते. यही नहीं विवाह के अलावा और भी कई ऐसे शुभ काम हैं, जो चातुर्मास में बंद रहते हैं. आइए इन कामों के बारे में जानते हैं.
चातुर्मास में विवाह समेत नहीं होंगे ये काम
जब भगवान विष्णु विश्राम करते हैं, तो उस समय शुभ और मांगलिक काम न करने की सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान शुभ और मांगलिक काम करने का शुभ प्राप्त नहीं होता. चातुर्मास में शादी-विवाह पर पूरी तरह से रोक होती है, लेकिन इसके साथ-साथ गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन, भूमिपूजन, नए भवन का निर्माण, बड़े शुभ समारोह और अन्य मांगलिक कामों से भी परहेज किया जाता है. बहुत लोग इस समय बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदारी भी नहीं करते. इस साल 25 जुलाई से सभी शुभ काम बंद होंगे और फिर 20 नवंबर से शुरू होंगे.
धार्मिक गतिविधियों का मिलता है विशेष लाभ
चातुर्मास में धार्मिक गतिविधियां नहीं रुकती हैं. इसके विपरीत चातुर्मास को साधना, संयम और भक्ति का सबसे उत्तम समय बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार, इस दौरान मंदिरों में भागवत कथा, सत्संग, भजन-कीर्तन, जप, तप और दान-पुण्य का विशेष पुण्य प्राप्त होता है. धार्मिक ग्रंथों में चातुर्मास के चार महीनों को आत्मचिंतन, तपस्या और आध्यात्मिक उन्नति का काल माना गया है. साधु-संत भी चातुर्मास के दौरान एक ही स्थान पर रहते हैं और तप, स्वाध्याय व प्रवचन करते हैं.
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