यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य बिजली वितरण कंपनी के एक पूर्व कर्मचारी प्रसाद नायक (70 वर्ष) से जुड़ा है। साल 2012 में एक निचली अदालत ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था।
इस सजा के आधार पर कंपनी ने उन्हें अप्रैल 2013 में नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। साल 2018 में अपनी अपील लंबित रहने के दौरान ही वे रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच गए।
इसके बाद साल 2020 में हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया। बरी होने के बाद बिजली कंपनी ने 2021 में उनका बर्खास्तगी आदेश तो वापस ले लिया और सांकेतिक तौर पर पेंशन लाभ दे दिए, लेकिन अप्रैल 2013 से अगस्त 2018 के बीच का पिछला वेतन और एरियर देने से साफ मना कर दिया।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
प्रसाद नायक ने पिछले वेतन के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ‘नो वर्क, नो पे’ के कानूनी सिद्धांत को सही ठहराया। अदालत ने साफ किया कि जब कर्मचारी ने उस विवादित अवधि के दौरान विभाग में कोई व्यावहारिक सेवा नहीं दी, तो वह पूरे पिछले वेतन को अपने अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकता। कंपनी द्वारा बर्खास्तगी आदेश वापस लेकर केवल सेवा की निरंतरता के सीमित लाभ देना पूरी तरह न्यायसंगत है।
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