सारंगढ़:
फरवरी का महीना अपने आखिरी पड़ाव पर है, लेकिन कैलेंडर की गिरती तारीखों से ज्यादा चिंता उन परिवारों को सता रही है जिनका निवाला सरकारी उचित मूल्य की दुकानों पर अटका हुआ है। सरसींवा सहित आसपास के क्षेत्रों में पिछले एक सप्ताह से ई-पॉस (e-POS) मशीनों में सर्वर की अनियमितता ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की कमर तोड़कर रख दी है।

घंटों इंतजार, फिर भी हाथ खाली-
हालात यह हैं कि राशन दुकानों पर सर्वर का साथ केवल सुबह 10:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक ही मिल पा रहा है। दूसरे पहर में सर्वर पूरी तरह दम तोड़ देता है, जो दुकान संचालकों के लिए सिरदर्द और हितग्राहियों के लिए मायूसी का कारण बन रहा है।
लंबी कतारें, बढ़ती तकरार-
मशीनों के ऑनलाइन न होने के कारण बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे दुकानों पर अफरातफरी और बहस की स्थिति निर्मित हो रही है।
मजबूर संचालक-
दुकान संचालकों का कहना है कि तकनीकी खामी उनके नियंत्रण से बाहर है, लेकिन जनता की नाराजगी का सामना उन्हें ही करना पड़ रहा है।
त्यौहार की खुशियों पर ‘तकनीकी’ ग्रहण-
मार्च का महीना होली जैसे बड़े त्यौहार के साथ दस्तक देने वाला है। त्यौहार से पहले राशन का समय पर न मिलना निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए एक बड़ी आपदा जैसा है। यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो केवल सरसींवा क्षेत्र के ही लगभग 400 से अधिक हितग्राही परिवार अपने निर्धारित कोटे से वंचित रह जाएंगे।
प्रशासन से सीधे और ‘कड़वे सवाल’
डिजिटल इंडिया या डिजिटल धोखा?
जब पूरी व्यवस्था को ऑनलाइन कर दिया गया है, तो निर्बाध इंटरनेट और सर्वर सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है?
गरीब की भूख का क्या? क्या विभाग को इस बात का अंदाजा है कि सर्वर डाउन होने का मतलब सैकड़ों गरीब बच्चों का भूखा सोना हो सकता है?
सिर्फ कागजी सुशासन?
‘सर्विस टाइम आउट’ का मैसेज दिखाकर क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकता है?
समाधान कब?
क्या विभाग वितरण की अवधि बढ़ाएगा या सर्वर की खामी को त्यौहार बीत जाने के बाद ठीक किया जाएगा?
यह महज तकनीकी खराबी का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता पर खड़ा एक बड़ा सवालिया निशान है। अब निगाहें प्रशासनिक तत्परता पर टिकी हैं—क्या गरीब को उसका हक मिलेगा या सर्वर की भेंट चढ़ जाएगा उनका राशन?
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