हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा पति को बेरोजगार होने का ताना मारना और आर्थिक तंगी के दौरान अनुचित मांगें करना मानसिक क्रूरता है. इसी आधार पर पति को तलाक की अनुमति दी जा सकती है.

जस्टिस रजनी दुबे और अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने तलाक के मामले में यह बात कहते हुए एक व्यक्ति को उसकी पत्नी से तलाक दे दिया.

यही नहीं हाईकोर्ट फैमली कोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें पहले पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी. पति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पत्नी ने पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने और स्कूल प्रिंसिपल के रूप में पद हासिल करने के बाद, कथित तौर पर उसका अपमान करना और उससे झगड़ा करना शुरू कर दिया. विशेष रूप से कोविड महामारी के दौरान जब उसकी आय का स्रोत बंद हो गया.
डिग्री और नौकरी पाने के बाद व्यवहार बदला
बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित किया गया है कि पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने और प्रिंसिपल के रूप में उच्च वेतन वाली नौकरी हासिल करने के बाद, पत्नी का याचिकाकर्ता पति के प्रति व्यवहार काफी परिवर्तित हो गया. पत्नी अपने पति का अपमान करने लगी. कोविड महामारी के दौरान बेरोजगार होने के लिए उसे बार-बार ताना मारने लगी छोटी-छोटी बातों पर बार-बार गाली-गलौज करने लगी.
पीठ ने कहा कि ये काम स्पष्ट रूप से कानून के तहत मानसिक क्रूरता कहा जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी ने कथित तौर पर अपनी बेटी को उसके पिता के खिलाफ कर दिया. अगस्त 2020 में बेटी के साथ ससुराल छोड़ दिया. उसने अपने बेटे को छोड़ दिया. एक पत्र में उसने स्वेच्छा से घर छोड़ने और पति और बेटे दोनों से संबंध तोड़ने का फैसला सुनाया. पति ने कोर्ट ने पत्नी के पत्र सहित मौखिक और दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत किए.
फैमली कोर्ट ने की थी पति की याचिका खारिज
वहीं नोटिस दिए जाने के बावजूद, पत्नी कोर्ट में पेश नहीं हुई और न ही कोई जवाब दाखिल किया. फैमली कोर्ट ने फिर भी पति की याचिका खारिज कर दी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि फैमली कोर्ट पति के दावों की अखंडनीय प्रकृति को समझने में विफल रहा. पत्नी के कृत्य हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) (आईए) और (आईबी) के तहत क्रूरता और परित्याग दोनों के बराबर हैं, यह मानते हुए हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक का आदेश दिया.
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