16 जुलाई 2026 को निकलेगी जगन्नाथ रथ यात्रा लेकिन उसकी तैयारी और यात्रा के पूर्व कई प्रकार के रीति रिवाज रहते हैं। जगन्नाथ रथयात्रा में शामिल होने जा रहे हैं तो जान लें कि वहां पर किन रीति रिवाजों का पालन होता है।

रथ निर्माण, ओसर घर, छर पहनरा, गुंडीचा मार्जन, रथयात्रा का आरंभ, गुंडिचा मंदिर आगमन, हेरा पंचमी, बहुड़ा यात्रा और पुन: मंदिर आगमन तक की संपूर्ण जानकारी।
- रथों का निर्माण: बिना कील/धातु के नीम की लकड़ी से 3 रथ बनते हैं। सबसे आगे बलरामजी का ‘तालध्वज’ (लाल-हरा), बीच में सुभद्राजी का ‘दर्पदलन’ (काला/नीला-लाल) और सबसे पीछे जगन्नाथजी का ‘नंदीघोष’ (लाल-पीला) रथ होता है।
- प्रभु का बीमार होना: यात्रा से 15 दिन पहले 108 कलशों से स्नान के बाद प्रभु बीमार हो जाते हैं और ‘ओसर घर’ में विश्राम करते हैं। स्वस्थ होने पर वे ‘नव यौवन नैत्र उत्सव’ में दर्शन देते हैं।
- छर पहनरा/छेरा पहरा रस्म: रथयात्रा से पहले पुरी के गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथ मण्डप और रास्ते की सफाई करते हैं।
- गुंडीचा मार्जन: रथयात्रा से एक दिन पहले श्रद्धालु पवित्र जल से गुंडीचा मंदिर को धोकर साफ करते हैं।
- रथयात्रा का आरंभ: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ढोल-नगाड़ों के साथ यात्रा शुरू होती है। सबसे पहले बलरामजी, फिर सुभद्राजी और अंत में जगन्नाथजी का रथ खींचा जाता है। रथ खींचने वाले को महाभाग्यवान माना जाता है।
- गुंडिचा मंदिर आगमन: यह यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर 2 किमी दूर मौसी ‘गुंडिचा मां’ के मंदिर पहुंचती है, जहाँ भगवान 7 दिनों तक विश्राम करते हैं। यहाँ दर्शन करने को ‘आड़प-दर्शन’ कहते हैं।
- हेरा पंचमी: यात्रा के पांचवें दिन माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को खोजने गुंडिचा मंदिर आती हैं।
- बहुड़ा यात्रा (वापसी): आषाढ़ दशमी (नवें दिन) को रथों की मुख्य मंदिर की ओर वापसी होती है, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ कहते हैं।
- मंदिर प्रवेश: नौवें दिन वापसी के बाद भी प्रतिमाएं रथ में रहती हैं। अगले दिन एकादशी को विधिवत स्नान और पूजा के बाद उन्हें पुनः मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है।
जगन्नाथ रथ खींचने का महत्व:
दुनिया का कोई भी व्यक्ति या भक्त इन रथों को खींच सकता है। मान्यता: जो भी भक्त इस पावन रथयात्रा में सम्मिलित होता है, उसे 100 यज्ञों के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। भक्तगण एक निश्चित क्रम से तीनों रथों की रस्सियों को श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। ऐसी अटूट धार्मिक मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान जगन्नाथ का रथ खींचता है, वह जीवन-मरण के चक्र (आवागमन) से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।
जगन्नाथ के 3 रथों की जानकारी
नंदीघोष (गरुड़ध्वज): ऊंचाई करीब 45 फीट, पहियों की संख्या 16, पवित्र रस्सी का नाम शंखाचुड़ा नाड़ी।
तालध्वज: ऊंचाई करीब 43 फीट, पहियों की संख्या 14, पवित्र रस्सी का नाम बासुकी।
दर्पदलन (पद्म रथ): ऊंचाई करीब 42 फीट, पहियों की संख्या 14 और पवित्र रस्सी का नाम स्वर्णचूड़ा नाड़ी।
तीनों रथ की यात्रा: विशाल रथों को खींचकर 3 किलोमीटर दूर स्थित ‘गुंडिचा मंदिर’ ले जाया जाता है। गुंडिचा मंदिर में भगवान 10 दिनों तक आराम करते हैं। यात्रा के 11वें दिन महाप्रभु पुनः अपने मुख्य जगन्नाथ मंदिर लौट आते हैं।
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